Poetry

एक अधूरी सी ख्वाहिश

हर रोज चले जाते हैं जिंदगी के सफर में ,
वक्त ने इतना उलझा रखा है अपनी ही कशमकश में।
न कभी हवा के झोंके सहलाते हैं,
न चिड़ियों का चहचहाना सुनाई देता है,
ऐसा हो गया है मानो मुझसे जिंदगी ने मुंह मोड़ लिया है।
दिन की बेचैनी ने सिर्फ करवटे छोड़ी हैं रातो में ,
बचपन की वो नींद कहीं दफ़न हो गई है जिंदगी की भीड़ में।
शायद आगे निकलने की होड में,
जिंदगी कहीं पीछे छूट सी गई है,
और वक़्त बेवक़्त मुझे सिर्फ़ तरसने छोड़ गई है।
आज लगता है काश इतना भागना जरुरी न होता,
जिंदगी को सबके नजरिये से मापना जरुरी न होता।
लौट जाते बेफिक्र उस दुनिया मैं,
जहाँ खुदको दाव पे लगाना जरुरी न होता।

समेट कर खुदको सोचा, चलो आज फिरसे जिंदगी को गले लगाते हैं ,
जिंदगी कहीं खो गई है उसे ढूंढ कर लाते हैं।
जिंदगी मुस्कुराई और बोली, यह ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी
न तू बदलेगा न मैं तुझे मिलूंगी।
तू आज मुझे याद करेगा, कल दुनिया की भीड़ मैं वहीँ काम करेगा ,
अब यह लुक्का-छिप्पी तब तक चलेगी,
जब तक तू रहेगा या तेरी ज़िद रहेगी,
और तब तक यह ख्वाहिश अधूरी ही रहेगी।

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